यह कहानी है 6 दिसम्बर की बर्फीली सुबह की ।। हर रोज से उस दिन की सुबह कुछ अलग थी... मैं अपनी रोज की दिनचर्या के मुताबिक 7 बजे उठा, मगर न जाने क्यों आज मेरे मखमली बिस्तर और कोमल रजाई ने मुझे कुछ जकड़ सा लिया ... मानो वह मुझे अपने आगोश़ में लेना चाहते हों ... तभी मेरी माँ ने रेडियो चालू किया जिस पर चल रहे संगीत के बोल कुछ यूँ थे"आज जाने की जिद न करो.." इस गाने ने तो मुझे मानो रोक सा लिया था...लेकिन कम्बख्त घड़ी ने मुझे वास्तविक्ता से परिचय कराया की जनाब उठिये वरना अपने गंतव्य को पहुँचने में देर हो जाएगी।। फिर क्या रजाई को हटा कर मै बाथरूम को यूँ बढ़ा जैसे किसी जवान को उसकी शादी के अगले दिन ही सीमा पे जाने का बुलावा आ गया हो ।
भारी मन से मैंने नाम मात्र का स्नान और नाश्ता लिया और अपनी बाइक घर से बाहर निकाली ही थी की धुंध ने मेरी आँखों के आगे अँधेरा कर दिया। कड़ाके की ठण्ड ने मेरे शरीर को छुआ ही था कि मेरे शरीर के सारे रौंगटे खड़े हो गए।। हिम्मत करते हुए कुछ दूर बढ़ा ही था कि मेरे शरीर में कुछ सरसराहट सी हुई और ये अनुभूति अपने साथ कुछ नया लेकर आई..देखते ही देखते एक पल में मेरे बाएं हाथ की कलाई के कुछ अंगुल ऊपर कुछ गुदगुदाहट सी महसूस हुई.. कमीज़ के बाजू चढ़ा के देखा तो एक कोमल सा गुलाबी रंग का एक दाना अपने अंदर सैलाब लिए दिखा... मैं रुक गया...वो मुझे और मैं उसे एक टक देखते रहे... मानो वक़्त थम सा गया था। इन दानो ने मात्र 3 दिन में मेरे पूरे शरीर पर कब्ज़ा कर लिया था।।
बस यही से शुरुआत हो चुकी थी इस कहानी की।। न जाने किस अध्याय तक मै पहुँच चुका हूं । आज 11वाँ दिन हो चला है। पर ये जाने कब अपने घर को जाएंगे इस किराये के मकान को अलविदा कह ।।
**आगे की कहानी जानने के लिए पढ़ते रहिये - मेरी कहानी, मेरी जुबानी" शिवम बाजपेई के संग ।
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