बचपन से लेकर आखिर तक जो हमारे पास रेहता है, वो क्या चीज़ है ? वो है शरीर, चाहे रोकर ये बात मानें चाहे हस कर, क्यूँ न हसकर ही माना जाये इस बात को।
वो भी किस तरह का शरीर, जो सुख भोग सकता है और सुख दे सकता है। सबसे महंगी मशीनरी है इसके अंदर, जिसमे हजारों तरह के प्रोसैस होते हैं हर वक़्त। विज्ञान ने भी इस बात को माना इसीलिए सबसे बड़ा धंधा बन गया है हैल्थ का।
अगली बात करें तो ये शरीर चलता कैसे है, काम करने कि शक्ति कैसे आएगी और साथ मे भोजन में बढ़िया स्वाद से सुख मिलता है, तो सुख को ध्यान मे रखते हुए जो धंधा बना तो अगला धंधा यह बन गया। इसीलिए पैक्ड फूड में बढ़िया स्वाद वाली चीजें।
कपड़े का तो सुख इस तरह का है , जैसे आत्मा को शरीर का सुख चाहिए था, आत्मा को तो तब भी इतना धैर्य है कि अपने लिए 80-90 साल तक एक ही कपड़ा पहनती है, उसी को ठीक करती है, उसी को बड़ा कारलेती , जरूरत के हिसाब से मोटा और पतला कारलेती है । आत्मा को ये ज्ञान है कि इस तरह का शरीर दिया जो ऑटोमैटिक काम करे। परंतु हमको इतना धैर्य नहीं होता, हमको चाहे जैसा कपड़ा हो, बस देखने में सुंदर हो और लोग तारीफ करें, फिर चाहे वो 2 ही बार पहन कर नया लेना पड़े।
हम सबके दिमाग ने भी सब कुछ ऐसा ही बनाने कि कोशिश की , पहले के जो लोग हुआ करते थे, उन्होने सबसे ज्यादा महत्व शरीर और उसके स्वास्थ्य पर दिया (क्यूंकि लोग अपने साथ दूसरों का खयाल रखने में सुख समझते थे), उसके बाद उनका काम शुरू हो गया कि निरंतर सुखी रहने के प्रयास का, खुद जितना जल्दी सीख गए, उतना और लोगों कि आत्मा को भी छुआ, और लोग भी इस तरह से सुखी हुए।
परंतु इस वक़्त हम सोचते हैं कि दूसरा बाहर कि वस्तुओं का उपभोग करके सुखी है, तो हम भी उपभोग कि चीज़ें इकट्ठा करते हैं, पुरानी चीज़ बहुत तेजो से फेंक रहे हैं , और नयी चीज़ लेते हैं। और प्रचार इस तरह से किया जा रहा है वस्तुयो का, कि हमें दिखाया जाता है कि हम खुश नहीं हैं, कि हमारे पास जरूरत कि चीज़ें बहुत कम हैं, हमे और खरीदना चाहिए, और फिर हम दुखी होते हैं कि वह कोई चुरा ना ले , उसके लिए सेक्युर्टी के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करना। इस जाल मे ऐसे फसे हैं कि हम खुद जीवन के अंत तक बिना सुखी हुए इस दुनिया से इस कीमती चीज़ (शरीर) का स्वास्थ्य भी खो देते हैं, फिर जिस शरीर से अब हमे आत्मज्ञान के लिए काम करना था। और फिर आत्मा वस्त्र बदल लेती है फिर अगला जन्म मिलता है और हमे क्यूंकी अगले जन्म मे भी यह ज्ञान नहीं होता कि आत्मासुख पाने के लिए आत्मा बार बार आपको नया शरीर दे रही है, लेकिन आप उस ज्ञान को नहीं समझना चाहते, प्रयास तक नहीं करना चाहते कि आत्मा जो कहना चाह रही है। जो भी काम कर रहे होते हैं साथ मै कई जगह दिमाग चल रहा होता है।
बस जिस भी काम को करें, जिस किसी से बात करें सबके ध्यान दें, वो ही ध्यान बहुत बड़ा ध्यान होता है।
और समझना इतना ही होता है कि हमारे पास जितना है वह जरूरत से ज्यादा है, जैसे ही अंदर से यह बात समझ आती है तो हम जो ज्यादा वाली चीज़ें हैं वो बस बांटना शुरू करदेते हैं और यह नहीं देखना पड़ता है कि जरूरतमन्द को देंगे, बस उसको जल्दी बांटते हैं जिससे कि अपना दुख कम हो जाये। क्यूंकी जरूरतमन्द को ढूंढने जाएँगे तो नहीं मिलेगा आपको , इसलिए जो अपने घनिस्ठ संबंध मे होते हैं जिनहे कोई भी वस्तु लेने मे शर्म न महसूस हो हम उनको अपनी चीज़ें बांट सकते हैं और खुद सुख का अनुभव करने लगते हैं। फिर वस्तुएं खतम होनेके बाद हाथ पैरों, मुह और अपने शरीर से हम सुख बांटटे हैं, तो सामने वाला आपकी उन बातों से सुखी भले ही ना हो , परंतु आपको सुख होता है। अगर आप आशा न करना, ऐसा स्वभाव ही बना लेते हैं, क्यूंकी आपको यह समझ मे आ गया होताहै कि मेरे पास तो इतना ज्यादा है वो हमे बांटना ही है , नहीं तो हम इतना ज्यादा का करेंगे क्या। ज्यादा चीज़ हमेशा कूड़ा बन जाती है॥ इत्यादि....
अपूर्ण जानकारी.......
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