आध्यात्मिक होने का मतलब है - आत्मा और शरीर के बीच के अंतर को समझना

 आध्यात्मिक होने का मतलब है - आत्मा और शरीर के बीच के अंतर को समझना


यदि शरीर कि आवश्यकता कि बात की जाये तो :
जब हम आध्यात्मिक होते हैं तो ये अंतर स्पष्ट दिखाई देता है कि यह जो शरीर है यह हमे पाँच तत्वों (प्रकृति) से मिला है। इसी को पुराने लोगों ने भगवान कहा (भ- भूमि, ग- गगन, व - वायु, आ- आकाश, न- नीर)। शरीर के लिए मुख्यतः यही भगवान हैं। हम अपनी समझ के आधार पर इन तीन को बेहतर करने मे प्रकृति का सहयोग कर सकते हैं,- बड़े वृक्षों मे, मिट्टी मे, पानी मे।

जीवन(आत्मा) अमर है , यही जीवन दोबारा फिर से दूसरा शरीर लेगा , तो इस जीवन मे आप जितनी सांसें लेते हैं उसके लिए कितने पेड़ कि आवश्यकता है इसके बारे मे विचार करने कि ज़िम्मेदारी आपकी है। आप अगर विचार नहीं करेंगे तो कोई और आपके लिए विचार नहीं करेगा।

वृक्ष का नियोजन के कुछ उपाय :
अनुमानित 60 साल शरीर से सांस लेनी है, तो बदले मे उतने पेड़ लगाएँ।
लकड़ी का समान इस्तेमाल करना है तो उतने पेड़ लगाएँ।

पानी - पानी का नियोजन के कुछ उपाय-
जिन कपड़े बनने मे ज्यादा पानी लगता है, वह कपड़े कम इस्तेमाल करें।
जिन शीतल पेय को बनाने मे पानी कि ज्यादा बरबादी होती है, उनका कम से कम चयन करें।
यदि संभव हो तो जो घर बनवाएँ उसमे बीच मे थोड़ा कच्चा स्थान छोड़ें, जहां से पानी वापिस जमीन के अंदर जा सके।
पार्क मे छोटा सा कच्चा तालाब जरूर हो।
किसान खेतों मे तालाब बनाएँ।

मिट्टी से निकली हुई वस्तुयो पर ध्यान दें और उसी प्रकार नियोजन करें:
आप गाड़ी इस्तेमाल करते हैं, उसके लिए लोहा जमीन से निकलता है।
पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं, वही भी मिट्टी के अंदर से निकलता है।
मिट्टी ने इस प्रकृति का तापमान को बनाए रखने के लिए धातु और पेट्रोल जैसे चीज़ें बनायीं। परंतु हमने उसका अपनी आवश्यकता के लिए इस्तेमाल करते हैं। मिट्टी को कई साल लगते हैं पेट्रोल और धातु बनाने मे, उसको ठीक से इस्तेमाल करने कि ज़िम्मेदारी को समझें।

जाब आपको (जीवन को) दोबारा जन्म लेना हो, इस धरती पर तो ठीक ठाक शरीर मिले, इसकी ज़िम्मेदारी आपकि है, किसी उर कि नहीं।

धन्यवाद,
शिवम बाजपेई
लखनऊ

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